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उदयपुर जयसमंद झील की तरह यहां के लोगों के रिश्तों में भी मिठास देखने को मिलती है। गांवों ने सोसायटी बनाकर नावें चलानी शुरू की हैं। न कोई ठेका है, न सरकारी नियंत्रण। ग्रामीणों को निशुल्क आवागमन के साथ आमदनी भी मिल रही है। एशिया की दूसरी सबसे बड़ी मीठे

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प्रदेश में अन्य झीलों और तालाबों में स्थानीय निकाय बोटिंग के ठेके से करोड़ों रुपए का रेवेन्यू कमाते हैं, लेकिन यहां झील के अंदर स्थित टापू गांवों की समितियां खुद नावों का संचालन करती हैं। झील में सभी नावें एक साथ खड़ी रहती हैं और पर्यटक जिस नाव में बैठते हैं, उसी में भ्रमण कराया जाता है।

सामान्य दिनों में भीड़ कम होने पर पर्यटकों को बहुत कम राशि में झील में घुमाया जाता है। यहाँ ग्रामीणों और पर्यटकों के बीच आपसी मिठास देखने को मिलती है, जैसे झील का मीठा पानी। बाबा मंगरा, भटवाड़ा टापू और गामड़ी जैसे गांवों की समितियां झील की पाल तक आने-जाने के लिए नाव चलाती हैं। टापू मुख्य सड़क से झील में 5 से 7 किमी अंदर हैं। ग्रामीणों को नाव से ही अपने गांव तक पहुंचना होता है। हर टापू ने अपनी-अपनी सोसायटी बनाकर नावों का संचालन किया है, जिससे ग्रामीणों को रोजगार और आवागमन का साधन दोनों मिल रहा है।

बाबा मंगरा गांव – 8 नाव भटवाड़ा गांव – 2 नाव गामड़ी गांव – 2 नाव रेबारियों का गुड़ा – 2 नाव वन विभाग की ईडीसी – 2 नाव रेट गुरिया – 1 नाव जय अंबे जल पर्यटन गामड़ी सोसायटी के अध्यक्ष कालू लाल मीणा बताते हैं कि जयसमंद में अलग-अलग गांवों की 5-6 सोसायटी हैं। हर सोसायटी को रोजाना 1,000 से 2,000 रुपए की आमदनी होती है। प्रत्येक सोसायटी में 20 से 100 सदस्य शामिल हैं और उन्होंने मिलकर नाव खरीदी है। गांव वालों के आवागमन के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाता। पर्यटकों से मिलने वाली राशि सोसायटी के खर्च, जैसे नाव का पेट्रोल, लाइसेंस फीस और स्टाफ की सैलरी, निकालने के बाद बांटी जाती है। इससे करीब 30 लोगों को रोजगार मिल रहा है। एशिया की दूसरी बड़ी मीठे पानी की झील पर्यटकों के बीच लोकप्रिय है।



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