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मूक प्राणियों के लिए राज्य भर में करीब 3000 अस्पताल हैं। शहरी क्षेत्रों में 98 पॉलीक्लिनिक हैं, लेकिन एक भी अस्पताल में इमरजेंसी में एक भी डॉक्टर उपलब्ध नहीं रहते। राज्य के इन पॉलीक्लिनिक की पड़ताल में सामने आया कि 5 से 15 डॉक्टर्स की पोस्टिंग के बावज
यही नहीं, राजधानी में राज्य के सबसे बड़े पांच बत्ती स्थित स्टेट वेटरिनरी पॉलीक्लिनिक में 15 डॉक्टर्स की पोस्टिंग है, पर रात में एक भी नहीं रुकते। पड़ताल में यह भी सामने आया कि रात में डॉक्टर नहीं, पशुधन निरीक्षक ही आपात स्थिति में यहां आने वाले पशुओं का इलाज करते हैं। जबकि राजस्थान वेटरिनरी कौंसिल की गाइडलाइन के अनुसार कोई भी ऐसा व्यक्ति जो कौंसिल में रजिस्टर नहीं, वह किसी भी पशु का इलाज नहीं कर सकता, लेकिन राज्य के तमाम पशु चिकित्सालयों में कमोबेश यही हाल है।
पशुपालन विभाग की नजरों के बीच ही प्रदेशभर में डॉक्टरों की अनुपस्थिति में अन्य कर्मचारी इलाज कर रहे हैं, जिनके लिए कौंसिल में स्पष्ट निर्देश हैं कि ऐसा करते पाए जाने पर उनके लिए 1000 रुपए जुर्माना या 6 माह कारावास की सजा का प्रावधान भारतीय पशु चिकित्सा परिषद अधिनियम-1984 की धारा 56 में किया गया है।
इंचार्ज बोले- आपात स्थिति में कॉल पर जाते हैं
प्रदेशभर के पॉलीक्लिनिकों के इंचार्ज या अन्य संबंधितों को फोन पर पूछा गया कि रात में पशु को दिखाना है, क्या डॉक्टर मिलेंगे। कुछ इस तरह के जवाब मिले-
1. रात में कोई डॉक्टर नहीं मिलते, सुबह आइये।
2. रात में आपात स्थिति हो तो कॉल पर ही डॉक्टर आते हैं।
3. इतने डॉक्टर नहीं हैं कि रात में भी कोई रुक सके।
4. रात में कॉल आता है तो मौके पर जाकर ही इलाज कर देते हैं।
5. रात में पशुधन निरीक्षक आदि रहते हैं जो प्राथमिक इलाज में सक्षम होते हैं, जरूरत पड़ती है तो हमें कॉल कर देते हैं।
सीएम ने दिए थे निर्देश, आज तक पालना नहीं मुख्यमंत्री ने 23 अप्रैल को विभाग की बैठक में स्पष्ट तौर पर सभी छोटे से बड़े पशु चिकित्सालयों की स्ट्रैंथन को लेकर निर्देश दिए थे। यही नहीं, पॉलीक्लिनिक और प्रथम श्रेणी अस्पतालों को 24 घंटे खुले रखने और डॉक्टर्स की उपस्थिति सुनिश्चित करने को भी कहा था, लेकिन तब से अब तक पशुपालन निदेशालय ने इस पर कोई एक्शन नहीं लिया।
“हम जल्द ही डॉक्टर्स की व्यवस्थाएं कर रहे हैं। आने वाले दिनों में सेवाओं में सुधार किया जाएगा।” – डॉ. समित शर्मा, सचिव, पशुपालन विभाग, राजस्थान
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