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थैलेसिमिया के वार्ड में भर्ती प्रसूताएं।

जिला अस्पताल में प्रसूताओं के लिए बेड नहीं हैं। अस्पताल में मरीज ओवरलोड हो रहे हैं। अब स्थिति यह बन गई है कि थैलेसीमिया रोगियों के लिए बने अलग वार्ड में सिजेरियन के बाद प्रसूताओं को सुलाया जा रहा है। ऐसे में थैलेसीमिया मरीजों में इन्फेक्शन का खतरा बन

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अस्पताल की एमसीएच विंग में गायनिक विंग की ओर से बनाए पोस्ट ऑपरेटिव वार्ड में स्वीकृत 20 बेड की ही व्यवस्था है। अस्पताल प्रशासन ने ओवरलोड मरीजों के लिए इसी वार्ड की गैलरियों व पास के कमरों में कुल 34 बेड की व्यवस्था की है। सिजेरियन प्रसव व स्त्री संबंधित रोगों में होने वाले ऑपरेशन के बाद बेड कम पड़ रहे हैं। गायनिक डॉक्टरों की ओर से रोजाना 12-15 सिजेरियन किए जा रहे हैं।

ऑपरेशन के बाद प्रसूताओं व महिला रोगियों को रखने के लिए बेड नहीं होने से मजबूरन सामान्य वार्डों में उन्हें शिफ्ट करना पड़ रहा है। अस्पताल प्रशासन की ओर से पीएनसी वार्ड में भी 10 बेड सिजेरियन केस के लिए रिजर्व कर रखे हैं, लेकिन ऑपरेशन बढ़ने के साथ बेड कम पड़ रहे हैं।

थैलेसीमिया वार्ड में अति गंभीर बीमार बच्चे भर्ती

एमसीएच विंग में थैलेसीमिया रोगियों के लिए हाल ही में संस्था के सहयोग से नया वार्ड खोला गया है। अब तक वार्ड में 120 थैलेसीमिया रोगियों का इलाज के साथ ब्लड चढ़ाया गया है। इस वार्ड में रोजाना 3-4 थैलेसीमिया के बच्चों को भर्ती किया जाता है। इन रोगियों की इम्युनिटी पावर बहुत कमजोर होती है। हीमोग्लोबिन नहीं बनने से 15 से 20 दिन बाद इन्हें खून चढ़ाना पड़ता है ताकि उम्र लंबी हो सके। लेकिन अब अस्पताल प्रशासन की ओर से मजबूरन थैलेसीमिया वार्ड को भी जनरल वार्ड में बदल दिया गया है। ऐसे में अब थैलेसीमिया रोगियों में इन्फेक्शन का खतरा मंडरा रहा है।

परिजन बोले: थैलेसीमिया वार्ड में इन्फेक्शन का खतरा

“थैलेसीमिया वार्ड में गायनिक के मरीजों को भर्ती किया गया है। इस वार्ड को थैलेसीमिया रोगियों के लिए अलग से बनवाया गया था। संस्था की ओर से साफ-सुथरा व आधुनिक सुविधाओं के साथ वार्ड को तैयार करवाया गया। प्ले एरिया, एसी, एलईडी – सभी कुछ व्यवस्था की गई ताकि बच्चे इलाज के दौरान थोड़ी खुशी महसूस करें। आसपास के जिलों से करीब 100 थैलेसीमिया रोगियों का इलाज चल रहा है। अब अन्य मरीजों के भर्ती होने से थैलेसीमिया मरीजों में इन्फेक्शन का खतरा बढ़ गया है। मुझे पता नहीं था, मैं बच्चे को ब्लड चढ़ाने के लिए लेकर आ गया। अन्य 2-3 मरीज भी आने वाले थे, लेकिन वे ऐसे हालात को देखते हुए नहीं आए।”

– हबीब खान, मीठे का तला।

“एनजीओ की ओर से दो महीने पहले ही अस्पताल में अलग से थैलेसीमिया वार्ड बनाया गया है। इसमें थैलेसीमिया के बच्चों को ही सुलाया जाना चाहिए। उनकी इम्युनिटी बहुत कमजोर होती है। मरीजों को 12-15 दिन में ब्लड चढ़ाया जाता है। गायनिक मरीजों को वार्ड में शिफ्ट करने पर बच्चों को खतरा बना हुआ है।”

– भरत शर्मा, सचिव थैलेसीमिया सोसाइटी, बाड़मेर।

“अस्पताल में सिजेरियन प्रसव की संख्या लगातार बढ़ रही है। रोजाना 12-15 सिजेरियन हो रहे हैं। दो-चार दिन से पोस्ट ऑपरेटिव वार्ड ओवरलोड चल रहा है। प्रसूताओं के लिए बेड नहीं होने पर इन्हें थैलेसीमिया वार्ड में शिफ्ट किया गया है। मरीजों की तादाद कम होने पर इसे दोबारा से सेपरेट बनाया जाएगा।”

– डॉ. बी.एल. मसूरिया, अधीक्षक, जिला अस्पताल, बाड़मेर।



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