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राजस्थान हाईकोर्ट ने बीएससी नर्सिंग कोर्स की काउंसलिंग प्रक्रिया पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। इस संबंध में राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ एंड साइंसेज (RUHS) की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस बिपिन गुप्

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दरअसल, आरयूएचएस की ओर से अधिवक्ताओं ने कोर्ट में याचिका दायर कर काउंसलिंग पर रोक लगाने की अपील की थी। इसमें बताया गया कि NOCs (नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट) को अंतिम रूप दिए बिना काउंसलिंग कराने से इस स्तर पर विसंगतियां पैदा हो सकती हैं। दूसरी ओर, सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता नरेंद्र सिंह राजपुरोहित ने भी इस पर सहमति जताते हुए कोर्ट को बताया कि, जब तक अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC) से जुड़े मामलों का निपटारा नहीं हो जाता, तब तक काउंसलिंग को रोक दिया जाए। इन मुद्दों को हल किए जाने के बाद ही काउंसलिंग की अनुमति दी जानी चाहिए।

इस संयुक्त प्रस्ताव का तर्क यह था कि यदि एनओसी को अंतिम रूप दिए बिना काउंसलिंग की अनुमति दी जाती है, तो इससे “किसी भी तरह की विसंगतियों” और “विरोधाभासी अधिकार’ पैदा हो सकते हैं। कोर्ट ने RUHS और राज्य सरकार, दोनों के संयुक्त प्रस्ताव को “उचित” माना।

इस मामले में निजी नर्सिंग कॉलेजों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था – प्राइवेट फिजियोथेरेपी, नर्सिंग और पैरा मेडिकल इंस्टीट्यूशंस सोसाइटी जोधपुर को नोटिस जारी किया है। वहीं, इस मामले में राज्य सरकार के अलावा, राजस्थान नर्सिंग काउंसिल, जयपुर, और दीपशिखा कला संस्थान (रीजनल नर्सिंग कॉलेज, धामोतर) भी पक्षकार हैं।

कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह NOCs से संबंधित मुद्दों को जल्द से जल्द हल करे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एक बार जब NOCs को निपटा दिया जाता है, तो कोई भी पक्ष काउंसलिंग को फिर से शुरू करने के लिए आवेदन कर सकता है, जिस पर नियमानुसार विचार किया जाएगा।

पृष्ठभूमि: NOCs, निरीक्षण और फाइलों में देरी

राजस्थान में नर्सिंग शिक्षा क्षेत्र लंबे समय से विवादों में आता रहा है। नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता रद्द करने या उन्हें फिर से शुरू करने के लिए आवेदन देने पर भी, कई फाइलें और आवेदन वर्षों तक लंबित रहते हैं। इसी को लेकर कई तरह के आरोप लगते रहे हैं कि कुछ अधिकारी जानबूझकर फाइलों को रोककर रखते हैं।

पूर्व में कुछ मामलों में तो फर्जी दस्तावेजों और गलत निरीक्षण रिपोर्टों के आधार पर मान्यताएं देने के मामले में सामने आ चुके हैं। ऐसे ही चार नर्सिंग कॉलेजों के खिलाफ तो भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने मामले भी दर्ज किए थे। जिनमें दुर्गा नर्सिंग कॉलेज का मामला भी शामिल है। इस कॉलेज को बिना किसी बिल्डिंग के ही गलत एनओसी देकर मान्यता दे दी गई थी। इसी तरह, नागौर के गीतांजलि कॉलेज ऑफ नर्सिंग के मामले में, संबद्ध अस्पताल में 30 बेड की अनुमति होने के बावजूद निरीक्षण अधिकारियों ने क्षमता से अधिक बेड बताकर ‘ओके’ रिपोर्ट दे दी थी।

एनओसी और मान्यता से जुड़ी फाइलों को लंबित रखने का आरोप सीधे तौर पर भ्रष्टाचार से जुड़ा है। मई 2022 में, एसीबी ने राजस्थान नर्सिंग काउंसिल के कनिष्ठ सहायक नंदकिशोर शर्मा को एक निजी कॉलेज संचालक बंशीधर गुर्जर से 1.90 लाख रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। यह रिश्वत कॉलेज की मान्यता बनाए रखने, सीटों की संख्या बढ़ाने और निरीक्षण के समय ‘नरमी’ बरतने के एवज में दी जा रही थी। एसीबी अधिकारियों को भी इतनी बड़ी राशि देखकर इस पूरे रैकेट में उच्चाधिकारियों की मिलीभगत का संदेह हुआ था।

छात्रों का भविष्य अधर में: NOCs के अभाव में असर

प्रशासनिक देरी और अनियमितताओं का सबसे बड़ा खामियाजा नर्सिंग के छात्रों को भुगतना पड़ता है। एक नर्सिंग कोर्स पूरा करने के बाद, छात्रों को राजस्थान नर्सिंग काउंसिल से अपना पंजीकरण नंबर (आरएन नंबर) प्राप्त करना होता है। यह नंबर उनके लिए एक वैध नर्स के रूप में काम करने के लिए अनिवार्य है। लेकिन यदि किसी कॉलेज के पास वैध एनओसी या मान्यता नहीं है, तो काउंसिल छात्रों को आरएन नंबर जारी करने से इनकार कर देती है, जिससे उनका भविष्य अधर में लटक जाता है ।

कुछ ऐसा ही हुआ था उदयपुर के तिरूपति स्कूल ऑफ नर्सिंग को लेकर। जहां के सैकड़ों छात्रों को इसी संकट का सामना करना पड़ा। कॉलेज की मान्यता 2022 में एनओसी की कमी के कारण रद्द कर दी गई थी। नतीजतन, पास-आउट छात्रों को उनका आरएन नंबर नहीं मिला, जिससे वे रोजगार प्राप्त नहीं कर सके।



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