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अब गिद्ध-बाज जैसे शिकारियों की रहस्यमयी दुनिया में इंसानों की एंट्री होने जा रही है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) के 5 युवा साइंटिस्ट ने जैसलमेर में इन वल्चर पर रिसर्च शुरू की है।

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इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य बिग बर्ड को बचाना और उनकी संख्या बढ़ाना है। इस रिसर्च में उनके शरीर पर कैमरे ट्रांसमीटर लगाए जा रहे हैं।

जिससे कि उनके घोंसलों तक पहुंचा जा सके। ये शिकार की पहचान कैसे करते हैं और मौत के बड़े कारण क्या हैं, ये पता लगाना भी रिसर्च का हिस्सा है।

जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क में अगस्त की शुरुआत में बाज पर कैमरा लगा कर उसे छोड़ा गया। इसके बाद उससे मिलने वाले डेटा पर रिसर्च किया जा रहा है।

जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क में अगस्त की शुरुआत में बाज पर कैमरा लगा कर उसे छोड़ा गया। इसके बाद उससे मिलने वाले डेटा पर रिसर्च किया जा रहा है।

पढ़िए-पूरे प्रोजेक्ट की इनसाइड स्टोरी…

डब्ल्यूआईआई इंडिया के वैज्ञानिक वरुण खेर ने बताया- वन विभाग के सहयोग से रैप्टर पारिस्थितिकी प्रोजेक्ट शुरू किया गया है।जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क में शिकारी पक्षियों पर रिसर्च पहली बार शुरू की गई है। इसके तहत अब तक 3 शिकारी पक्षियों पर जीपीएस ट्रांसमीटर लगाया गया है।

इजिप्शियन वल्चर और टॉनी ईगल को ट्रैक कर रहे

वैज्ञानिक ने बताया- ये पार्क रैप्टर पक्षियों के लिए देश का अहम क्षेत्र है। इस रिसर्च से पक्षियों की आवाजाही, निवास स्थान, प्रजनन व्यवहार और खतरों की जानकारी मिलेगी।

अगस्त महीने में एक इजिप्शियन वल्चर और 2 टॉनी ईगल को टैग किया है। वैज्ञानिक उनकी गतिविधियों, प्रवास मार्गों, भोजन के स्रोतों और आराम स्थलों की जानकारी जुटा रहे हैं।

साथ ही, शिकार और जहरीले पदार्थों जैसे खतरों की पहचान भी की जा रही है। उत्तराखंड में गिद्धों को जीपीएस ट्रांसमीटर लगाए गए हैं।

6 प्रजातियों को रिसर्च के लिए चुना गया

वैज्ञानिक वरुण खेर ने बताया- इस रिसर्च के लिए टेलीमेट्री टेक्नीक यूज की जा रही है। इस प्रोजेक्ट के लिए 6 प्रमुख प्रजातियों को चुना गया है।

इनमें रेड हेडेड वल्चर, व्हाइट वल्चर, इजिप्शियन वल्चर, इंडियन वल्चर, टॉनी ईगल और लैगर फाल्कन शामिल है। एक प्रजाति के अधिकतम 6 पक्षियों यानी कुल 36 ट्रांसमीटर लगाने की अनुमति मिल चुकी है।

रिसर्च टीम घोंसलों की निगरानी भी कर रही है। यह भी देखा जा रहा है कि इन पक्षियों को क्षेत्र में कौन कौन से खतरे हैं। इससे संरक्षण के ठोस कदम उठाने में मदद मिलेगी।

अब देखिए- रिसर्च से जुड़ी PHOTOS…

तस्वीर, डेजर्ट नेशनल पार्क में आई वैज्ञानिकों की टीम की है। ये अगले 4 महीने से भी ज्यादा वक्त तक शिकारी पक्षियों को लेकर रिसर्च करेंगे और उन्हें जिंदा रखने के तरीके सुझाएंगे।

तस्वीर, डेजर्ट नेशनल पार्क में आई वैज्ञानिकों की टीम की है। ये अगले 4 महीने से भी ज्यादा वक्त तक शिकारी पक्षियों को लेकर रिसर्च करेंगे और उन्हें जिंदा रखने के तरीके सुझाएंगे।

टीम एक बार गिद्ध को पकड़ने पर उसके स्वास्थ्य की जांच कर डिवाइस लगा कर उन्हें छोड़ देती है। इस टीम में डॉक्टर सुतीर्था दत्ता, वरुण खेर, डेविड फ़िनहोस, मानस शुक्ला, और मिहिर जाधव शामिल हैं।

टीम एक बार गिद्ध को पकड़ने पर उसके स्वास्थ्य की जांच कर डिवाइस लगा कर उन्हें छोड़ देती है। इस टीम में डॉक्टर सुतीर्था दत्ता, वरुण खेर, डेविड फ़िनहोस, मानस शुक्ला, और मिहिर जाधव शामिल हैं।

अब जानिए- गिद्ध और बाज से जुड़े मिथक

चूजों को चट्टान से फेंक देते हैं?

वैज्ञानिक खेर ने बताया- लोगों के बीच में गिद्ध को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं। इनमें से एक है अपने बच्चे को चट्‌टान से फेंकना। हालांकि ये सच नहीं है।

दरअसल, ऊंची जगहों पर घोंसला बनाने वाले बाज के बच्चे चट्टानों या पेड़ों की डाल से कूदकर उड़ना सीखते हैं। ठीक ऐसे ही अन्य पक्षियों के बच्चों के साथ भी होता है।

क्या खुद चोंच तोड़ लेता है बाज?

खेर के अनुसार बाज को लेकर भी एक मिथक है कि बाज बूढ़ा होने पर अपनी चोंच तोड़ लेता है। वो दूसरी चोंच आने तक किसी अज्ञात जगह पर चले जाते हैं। यह झूठ है, किसी भी पक्षी की चोंच टूट जाए तो वह जिंदा नहीं बचता।



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