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देशभर के किसानों को मोठ की ऐसी किस्म मिलने जा रही है, जो बिना या कम बारिश में भी अच्छी पैदावार देगी। मानसून में 40 दिन के सूखे के बाद भी बारिश की नमी से खुद को जिंदा रख सकेगी।

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ये खास किस्म तैयार की है जोधपुरी के केंद्रीय शुष्क अनुसंधान संस्था (काजरी) ने। ये खास किस्म जल्द ही देशभर के किसानों को उपलब्ध कराई जाएगी।

दावा है कि ये उत्पादन भी पुरानी किस्म से ज्यादा देगी इससे पहले साल 2005 में मोठ की नई वैरायटी तैयार हुई थी।

इस बार म्हारे देस री खेती में मोठ के नए किस्म के बीज की कहानी…

काजरी की ओर से 10 हेक्टेयर में इसके बीज तैयार किए गए है। वैज्ञानिकों की देखरेख में ये पूरा रिसर्च हुआ।

काजरी की ओर से 10 हेक्टेयर में इसके बीज तैयार किए गए है। वैज्ञानिकों की देखरेख में ये पूरा रिसर्च हुआ।

पुराने बीज बारिश की कमी या सूखा नहीं झेल पाते थे

मोठ की फसल मानसून सीजन के दौरान होती है। इसके लिए 200 से 250 एमएम बारिश की आवश्यकता होती है। इससे कम बारिश होने या जमीन में नमी कम होने के बाद ये मोठ की फसल सूखने लग जाती थी।

ऐसे में काजरी ने साल 2017 से इस पर रिसर्च शुरू किया। अब काजरी ने 4,5,6 और 7 नई वैरायटी तैयारी की है। ये ऐसी किस्म है जो 40 दिन के सूखे के बाद भी खुद को जिंदा रख सकेगी और अच्छी पैदावार देगी।

काजरी के चीफ साइंटिस्ट एचआर मेहला ने बताया कि काजरी मोठ के बीज तैयार कर केंद्रीय बीज निगम का भेजेगा।

काजरी के चीफ साइंटिस्ट एचआर मेहला ने बताया कि काजरी मोठ के बीज तैयार कर केंद्रीय बीज निगम का भेजेगा।

अप्रूव होने के बाद देशभर के किसानों को मिलेंगे

साइंटिस्ट एचआर मेहला ने बताया कि काजरी पिछले एक दशक से मोठ की नई किस्म विकसित करने के लिए लगातार रिसर्च कर रहा है।

नई वैरायटी काजरी मोठ 4 और 5 के 44 क्विंटल और 6 और 7 के 11-11 क्विंटल बीज 10 हेक्टेयर में तैयार कर रहे हैं। इन बीजों को राज्य बीज निगम और केंद्रीय बीज निगम को भेजा जाएगा।

यहां से प्रमाणित होने पर इन्हें देशभर के किसानों को उपलब्ध करवाया जाएगा। केंद्रीय निगम बीज की ओर से प्रमाण पत्र जारी होने के बाद इन्हीं नए किस्म की बीज के आधार पर दूसरे बीज तैयार किए जाएंगे।

दावा है कि काजरी देशभर में 67 क्विंटल बीज किसानों को उपलब्ध करवाएगा।

मोठ की इस फसल को काजरी में तैयार किया गया है। ये कम वर्षा वाले इलाकों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।

मोठ की इस फसल को काजरी में तैयार किया गया है। ये कम वर्षा वाले इलाकों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।

बारिश का संतुलन खराब होने से नई किस्म की जरूरत- वैज्ञानिक

मेहला ने बताया कि पश्चिमी राजस्थान की बात की जाए तो यहां मोठ एक प्रमुख फसल है। यहां पर बारिश का संतुलन कभी सही नहीं रहता है। ऐसे में कई बार बारिश अच्छी नहीं होने की वजह से मोठ की फसल जल जाती थी।

दूसरा ये पौधा ज्यादा फैलता भी नहीं था। पुरानी किस्म 60 से 65 दिन में पक भी जाती थी, लेकिन बारिश कम हुई और नमी नहीं मिली तो सारी फसल बर्बाद हो जाती थी।

नए किस्म के बीज की ​फसल का ये पौधा लगातार फैलता जाता है। ये 75 से 80 दिन में पक जाता है। यदि 50 से 55 दिन के बाद भी बारिश होती है तो बारिश की नमी से ये पकना शुरू हो जाता है।

खास बात ये है कि 70 दिन बाद भी इसके पत्ते हरे रहेंगे और 60 दिन की क्रॉप के बाद प्रतिदिन एक फीसदी उपज में बढ़ोतरी होगी। दावा है कि 1 हेक्टेयर में ये बीज करीब 5 से 6 क्विंटल उत्पादन देंगे।

करीब 20 साल पहले तैयारी हुई थी वर्तमान वैरायटी

इससे पहले राजस्थान मोठ की कृषि विश्वविद्यालय बीकानेर की आरएमओ सिरीज से मोठ की फसल चलती थी। इसमें RMO 257, 40, 435 थी। ये फसलें 60 से 70 दिन में तैयार हो जाती थी। ये 90 के दशक में आई।

इसके बाद 2000 दशक की शुरुआत हुई तो काजरी ने मोठ का अनुसंधान कार्य शुरू किया। इसके बाद काजरी ने मोठ की किस्म 1 (1999), 2 (2002) और 3 (2005) को तैयार किया।

लेकिन इसके बाद एक लंबा अंतराल आ गया। साल 2017 में नई वैरायटी के लिए प्रयास शुरू किए गए। इसमें पिछले तीन साल में काजरी की तीन नई वैरायटी डेवलप की।

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